रखेगी याद दुनिया भी…

रखेगी याद दुनिया भी, सलीका छोड़ जाओ तुम,

ज़माने से दिलों का आज रिश्ता जोड़ जाओ तुम.

गुले-गुलज़ार होगा और परिंदे गीत गायेंगे,

अगर नफ़रत की गलियों से ये रिश्ता तोड़ जाओ तुम.

हजारों रंग बिखरे हैं चमन तो इक ही है अपना,

मुहब्बत के गुलों से और भी इसको सजाओ तुम.

बढ़े सीमा पे सरगर्मी सियासत छोड़ दो ऐसी,

दिलों से नफ़रतों की आग को पहले बुझाओ तुम,

पुराने ज़ख्म को ही क्यों कुरेदा जाता है अक्सर,

नयी हो बात दुनिया में, नया कुछ कर दिखाओ तुम.

देश प्रेम

ग़ज़ल
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देश हित में ही छुपा है जिंदगी का सार तो।
बात पर तुम गौर करना आज मेरी यार तो।।
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दर्द की  हो  बारिशें  चाहे कहीं भी  देश में,
ये हवाएँ  कह  रही है  आएगी  बौछार तो।
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हम यहाँ क्या जी रहे हैं सिर्फ लड़ने के लिए,
हम  सभी ने ही  बनाया देश को परिवार तो।
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क्या नहीं  मालूम  हमने त्रासदी  देखी  यहाँ,
खून की नदियाँ बहाता सिर्फ ये हथियार तो।
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एक जाती एक मज़हब एक है अपना वतन
एक  है  मंजिल   हमारी  एक है  सरकार तो।
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  रूप चंद जुम्हारे “रूप” गोंदिया(महा.)

👨आदमी👨

ग़ज़ल

बिना चांद के रास आती नहीं

अगर रात में चांदनी हो फ़कत.

तिरे अश्क पलकों पे लेकर मरूँ

मुलाकात वो आखिरी हो फ़कत.

यही सोचता तुम खड़ी तो नहीं

जरा खिडकियां गर खुली हो फ़कत.

कभी चैन दिल को मिलेगा नहीं,

अगर आग दिल में लगी हो फ़कत.

लगे जैसे जन्नत मुझे मिल गई

कहीं राह में वो मिली हो फ़कत.

सदा रूप खिलता रहे फूल सा,

जुबां पे मेरे शायरी हो फ़कत.

शायर- रूपचंद जुम्हारे “रूप”

¢¢कोरोना¢¢ संकट में सरकार कोरोना। चौपट कारोबार कोरोना। त्राहिमाम है सारा जीवन, कैसी तेरी मार कोरोना।। सूनी गलियां सूनी राहें, ताले लटके द्वार कोरोना। आना-जाना बंद हुआ है, बंद है मोटर कार कोरोना। घर में भी दीवार बनाकर, बैठे हैं लाचार कोरोना। मास्क लगाके जाना बाहर, बैठा है तैयार कोरोना। जान बचाएं कैसे सबकी, कोई है? उपचार कोरोना। आस लगाए बैठे हैं सब, करना माँ उद्धार कोरोना। ——————————-

अंदाज़ अपना-अपना

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रूह की आवाज होती है ग़ज़ल,

जिंदगी का राज़ होती है ग़ज़ल.

टूट जाए गर कहीं सीसा-ए-दिल,

इश्क का आग़ाज़ होती है ग़ज़ल.

प्यार से बस गुनगुना कर देख लो,

खूबसूरत साज़ . .  होती है ग़ज़ल.

आइने से इश्क ये किसने किया,
हर दिलों का राज़ होती है ग़ज़ल.

जिंदगी में  ढाई–आखर . . .है बहुत,
“प्यार” इक अल्फ़ाज़ होती है ग़ज़ल.

मारती ठोकर तिजारत को “सफ़र”
जीने का  अंदाज़. .  होती है ग़ज़ल.

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आईना-ए-ग़ज़ल

*जंग  होगी  तो   यही  अंजाम  होगा,
  हर तरफ़ शायद ये क़त्लेआम होगा.

*दनदनादन   बंदुकें  बम के   धमाके,
  हर  गली-कूचे में ये  कोहराम  होगा.

*हम दिखायेंगे  कहां  सूरत ये अपनी,
  मज़हबों के नाम जब  इल्ज़ाम होगा.

*आग नफ़रत की अगर फैली यहां पे,
  मुफ्त में ये  देश फिर  बदनाम  होगा.

*फिर सियासत गर्म होगी मज़हबों पर,
  औ” निशाने  पर  वही  आवाम होगा.

*क्यूं बहस अंजाम पे करते “सफ़र” हो,
  देश के  फिर नाम  इक  पैगाम  होगा.

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आइना जब आइना हो जाएगा

चॉद भी फिर देखकर शरमाएगा,

आइना जब . . आइना हो जाएगा.

जिंदगी. में आग से गुजरा अगर,

आदमी वो फिर  खरा  हो जाएगा.

नारियों पे जुल्म  यूं  बढ़ता  गया,

आदमी का सर  झुका  हो जाएगा.

मैं शमाँ  बनकर  जलुंगी  साथ में,

प्यार तेरा गुनगुना . . . हो जाएगा.

देखकर के मुस्कुरा  दो तुम अगर,

दिल हमारा बागबाँ . .  हो जाएगा.

जिंदगी  में जिंदगी  से प्यार  कर,

जिंदगी  का  ग़म दफ़ा  हो जाएगा.

चार दिन  की बस मुलाकातें यहां,

एक दिन फिर तू जुदा हो जाएगा.

फिर  डरा  सकता  हमें कोई नहीं,

हांथ तू गर दाहिना . . . हो जाएगा.

वो सदा से ही रहा  दिल  जीतकर,

क्या पता था वो. . ख़फ़ा हो जाएगा.

दिल भरोसे का  नहीं  होता “सफ़र”

क्या भरोसा कब  फ़िदा  हो जाएगा.

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ग़ज़ल-देखता जा…

ग़ज़ल

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चल रही है क्या सियासत  देखता जा,

फिर  वही  होगी हिमाकत  देखता जा.
चोर अब तो भागते . .  पतली गली से,

हो रही कैसी हिफ़ाजत . .. देखता जा.
दौड़ तेरी  है  कहां तक . . . . ये बता दे,

कर रहा फिर क्यूं शिकायत देखता जा.
फिटकरी को बेचे . . . . ठंडाई बनाकर,

कर  रहे कैसी मिलावट . . . देखता जा.
धर्म जाती मज़हबों के . . . . नाम पर ये,

बढ़ रही है क्यूं बग़ावत. . .  देखता जा.
ज़ख्म पे मेरे “सफ़र” . . . मरहम लगा दे,

है नहीं अब वो शराफ़त . . . देखता जा.

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है शायद. . .

कोई दिल  में गुब़ार  है शायद,

इश्क़ में दिल बिमार है शायद.

जुल्फें बिखरी हुई सी लगती हैं

भूत  सर  पे  सवार  है  शायद.

राह  से  हट  नहीं  रहा  है वो,

आज कोई  शिकार  है  शायद.

खत्म चुकता हिसाब कर देगा,

ज़ख़्म  कोई  उधार  है  शायद.

लोग समझा रहे बहुत उसको,

लग रहा  वो  गंवार  है  शायद.

जिंदगी का “सफ़र” नहीं आसां,

ग़म  यहां   बेशुमार   है  शायद.

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