अंदाज़ अपना-अपना

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रूह की आवाज होती है ग़ज़ल,

जिंदगी का राज़ होती है ग़ज़ल.

टूट जाए गर कहीं सीसा-ए-दिल,

इश्क का आग़ाज़ होती है ग़ज़ल.

प्यार से बस गुनगुना कर देख लो,

खूबसूरत साज़ . .  होती है ग़ज़ल.

आइने से इश्क ये किसने किया,
हर दिलों का राज़ होती है ग़ज़ल.

जिंदगी में  ढाई–आखर . . .है बहुत,
“प्यार” इक अल्फ़ाज़ होती है ग़ज़ल.

मारती ठोकर तिजारत को “सफ़र”
जीने का  अंदाज़. .  होती है ग़ज़ल.

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आईना-ए-ग़ज़ल

*जंग  होगी  तो   यही  अंजाम  होगा,
  हर तरफ़ शायद ये क़त्लेआम होगा.

*दनदनादन   बंदुकें  बम के   धमाके,
  हर  गली-कूचे में ये  कोहराम  होगा.

*हम दिखायेंगे  कहां  सूरत ये अपनी,
  मज़हबों के नाम जब  इल्ज़ाम होगा.

*आग नफ़रत की अगर फैली यहां पे,
  मुफ्त में ये  देश फिर  बदनाम  होगा.

*फिर सियासत गर्म होगी मज़हबों पर,
  औ” निशाने  पर  वही  आवाम होगा.

*क्यूं बहस अंजाम पे करते “सफ़र” हो,
  देश के  फिर नाम  इक  पैगाम  होगा.

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आइना जब आइना हो जाएगा

चॉद भी फिर देखकर शरमाएगा,

आइना जब . . आइना हो जाएगा.

जिंदगी. में आग से गुजरा अगर,

आदमी वो फिर  खरा  हो जाएगा.

नारियों पे जुल्म  यूं  बढ़ता  गया,

आदमी का सर  झुका  हो जाएगा.

मैं शमाँ  बनकर  जलुंगी  साथ में,

प्यार तेरा गुनगुना . . . हो जाएगा.

देखकर के मुस्कुरा  दो तुम अगर,

दिल हमारा बागबाँ . .  हो जाएगा.

जिंदगी  में जिंदगी  से प्यार  कर,

जिंदगी  का  ग़म दफ़ा  हो जाएगा.

चार दिन  की बस मुलाकातें यहां,

एक दिन फिर तू जुदा हो जाएगा.

फिर  डरा  सकता  हमें कोई नहीं,

हांथ तू गर दाहिना . . . हो जाएगा.

वो सदा से ही रहा  दिल  जीतकर,

क्या पता था वो. . ख़फ़ा हो जाएगा.

दिल भरोसे का  नहीं  होता “सफ़र”

क्या भरोसा कब  फ़िदा  हो जाएगा.

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ग़ज़ल-देखता जा…

ग़ज़ल

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चल रही है क्या सियासत  देखता जा,

फिर  वही  होगी हिमाकत  देखता जा.
चोर अब तो भागते . .  पतली गली से,

हो रही कैसी हिफ़ाजत . .. देखता जा.
दौड़ तेरी  है  कहां तक . . . . ये बता दे,

कर रहा फिर क्यूं शिकायत देखता जा.
फिटकरी को बेचे . . . . ठंडाई बनाकर,

कर  रहे कैसी मिलावट . . . देखता जा.
धर्म जाती मज़हबों के . . . . नाम पर ये,

बढ़ रही है क्यूं बग़ावत. . .  देखता जा.
ज़ख्म पे मेरे “सफ़र” . . . मरहम लगा दे,

है नहीं अब वो शराफ़त . . . देखता जा.

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है शायद. . .

कोई दिल  में गुब़ार  है शायद,

इश्क़ में दिल बिमार है शायद.

जुल्फें बिखरी हुई सी लगती हैं

भूत  सर  पे  सवार  है  शायद.

राह  से  हट  नहीं  रहा  है वो,

आज कोई  शिकार  है  शायद.

खत्म चुकता हिसाब कर देगा,

ज़ख़्म  कोई  उधार  है  शायद.

लोग समझा रहे बहुत उसको,

लग रहा  वो  गंवार  है  शायद.

जिंदगी का “सफ़र” नहीं आसां,

ग़म  यहां   बेशुमार   है  शायद.

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रास न आई दुनियां

ग़ज़ल

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जाने क्या सोच खुदा ने ये बनाई दुनिया,

मैं परेशॉ हुई जब मुझको ये लाई दुनिया.

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जिंदगी मुझको मिली  है ये  करम से तेरे,

जिंदगी  को  ये मेरी  खूब सताई  दुनिया.

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देखते रहते गली कूचे में कातिल मुझको,

और क्यूं जिस्म को ये नोंचके खाई दुनिया.

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लोग कहते कि हिफ़ाजत से रखेंगे तुमको,

हुश्न जो तू ने  दिया  आग   लगाई  दुनिया.

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वो बनाकर मुझे है शौक से घर में लाया,

फिर दहेजों के लिये सूली चढ़ाई दुनिया.

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मुझको शैतान ने कोठे पे बिठाया अपने,

दौलतें जिस्म से  ये खूब  कमाई. दुनिया.

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तेरी दुनिया से बहुत  दूर है  जाना मुझको,

अय खुदा मुझको नहीं रास ये आई दुनिया.

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दिल खोता नहीं…

ग़ज़ल-

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गर तुम नहीं होते तो दिल खोता नहीं,

दिन-रात तेरे प्यार में . .  . . रोता नहीं.

हमने दिया था दिल  नहीं सौदा किया,

इस प्यार का   व्यापार गर  होता नहीं.

हम को दिया . . जो ज़ख्म तू ने बेवफा,

उस जख्म को मैं उम्र भर.  ढोता  नहीं.

सब कुछ बहा कर ले  गया  सैलाब ने,

मैं इस कदर खाता  कभी  गोता  नहीं.

ये इश्क़ की राहें वफ़ा की . . है “सफ़र”

इस राह में कॉटे . . . . कोई बोता नहीं.

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